November 25, 2007
काश! की मैं भूमिहार ना होता,
तो यूँ जीने को मजबूर ना होता.
दसवीं मे पढ़ाई कर करके,
ये मोटा सा चश्मा गर लगाया ना होता,
तो गर्ल फ्रेंड से यूँ पराया ना होता,
काश! की मैं भूमिहार ना होता,
कॉलेज अड्मिशन मे धके खा ख़ाके,
ये जूता गर मेरा घिस्सा ना होता,
तो माँ की आँखों मे यूँ आँसू ना होता,
काश! की मैं भूमिहार ना होता,
इंटरव्यू मे प्रश्नोतर की जगह,
अगर! मैं हरिजन बोला होता,
तो अपने पास भी एक जॉब होता,
काश! की मैं भूमिहार ना होता,
ज़िंदगी मे जब भी ज़रूरत आन पड़ता,
हरिजन बनाना तब मुझे भता,
गाड़ी,बंगले,नौकर सब मैं पाता,
काश! की मैं भूमिहार ना होता,
अमू.
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November 25, 2007
मैने सोचना चाहा,
तुम आए,ज़िंदगी मे समाए
पर किस तरह,हाँ किस तरह
……………
भोर के उजास की तरह,
या साँझ की गहराई की तरह
दिन के रोशनी की तरह,
या रात की नीलीमा की तरह
तुम्हे मैने जाना
और तुम दिल मे समाए
पर किस तरह, हाँ किस तरह
…………….
सागर के लहरों की तरह
या फूलों की ख़ुश्बू की तरह
बारिश के बूंदो की तरह
या नभ पे छाए इंद्रधनुष की तरह
तुम्हे मैने चाहा
तुम धड़कन मे समाए
पर किस तरह,हाँ किस तरह
…………….
चिड़ीयों की चहचाहट की तरह
या बच्चे की किलकिलाहट की तरह
मंदिर के मूरत की तरह या
ज़िंदगी के गीत की तरह
मैने सोचना चाहा
तुम आए,ज़िंदगी मे समाए
पर किस तरह,हाँ किस तरह
…………….
अमू.
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November 19, 2007
मेरे यार का कहना है
कुछ फ़र्क नही पड़ता
जहाँ मैने लिखा था प्यार
वहाँ लिख दी तन्हाई
कुछ फ़र्क नही पड़ता
मेरे यार का कहना है
कुछ फ़र्क नही पड़ता
जहाँ मैने लिखा था चाय की प्याली
वहाँ लिख दी पैसे की आलमारी
कुछ फ़र्क नही पड़ता
मेरे यार का कहना है
कुछ फ़र्क नही पड़ता
जहाँ मैने लिखा था भोर का उजाला,
और चाँद की शीतलता.
वहा लिख दी सुबह की धूप,
और रात की ख़ामोशी.
कुछ फ़र्क नही पड़ता
मेरे यार का कहना है
कुछ फ़र्क नही पड़ता
जहाँ मैने लिखा था आत्मीयता
वहा लिख दिया बेगानापन
कुछ फ़र्क नही पड़ता
मेरे यार का कहना है.
ये आज के युग का भी मुहावरा है
कुछ फ़र्क नही पड़ता.
अमू.
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November 15, 2007
स्वप्न मे नीर का बहाव देखा था,
नींद खुली तो मरुस्थल मे पड़ाव देखा था,
स्वप्न मे हरा भरा मैदान देखा था,
नींद खुली तो पतझड का बाग़ देखा था.
स्वप्न मे भी डरने की आदत मेरी थी,
क्यूँकी भविष्य को वर्तमान मे तब्दील करती थी,
मैने ऐसा स्वप्न पहले कभी देखा ना था,
जहा भूत को वर्तमान मे लाया गया था.
वहाँ भाई भाई मे प्रेम था,
सारे जग से स्नेह था,
पशु पक्षी से मोह था,
माँ की आँखो मे नूर था.
भ्रष्टाचार का नाम ना था,
शोषण का काम ना था,
बेरोज़गारी का सवाल ना था,
नेताओं का बवाल ना था,
पर! नींद खुली तो……………..
भाई भाई का दुश्मन हो चला था,
जग से नाता भी टूट चूका था,
पशु पक्षी का ख़ात्मा हो चुका था,
रिश्तों मे भी ख़टास आ चला था.
भ्रष्टाचार का बोलबाला था,
शोषक राज मतवाला था,
बेरोज़गारी की समस्या थी,
नेताओं का घोटाला था.
स्वप्न का इशारा कही और नही था,
वक़्त रहते वक़्त को पहचानना हमे था,
शायद ये स्वप्न हक़ीकत बन जाए,
और ये हक़ीकत ख्वाब रह जाए.
पर! सपने की हक़ीकत यही है,
की वो सपना ही रहे,
तभी तो वो सुनहरा है,
और बाक़ी सब ज़हरीला है.
अमू.
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November 14, 2007
क्यूं रह जाते हैं कभी शब्द अनकहे?
अनजाने से, चुप से, नि:शब्द बनके?
क्या यह प्यार नही है?
क्या प्यार सिर्फ़ शब्दों की सीमा है जो
जब जी किया, जैसे जी किया,
बनाई, तोड़ी और फिर बनाई
नही! यह प्यार नही हो सकता!
प्यार तो अनकहे से शब्द हैं,
एक मौन रिश्ता है,
जिसकी बोली नही,
यह नयनों की भाषा है,
जो दिल मे उतरती है,
अजनबी होते हुए भी,
पहचान बनती है,
अनकही होते हुए भी राज खोलती है!
यह प्यार है………………
ये अनकहे शब्द जो प्यार से प्यारे हैं,
सारे जाग से निराले हैं,
ये शब्द, ये अनकहे अनजाने शब्द,
मेरे शब्द हैं,
हाँ! मेरे अपने शब्द
अगर समझ सको तो समझो
शायद……शायद समझ भी पाओ!
क्योंकि इसके लिए भी दिल चाहिए,
भावनाएँ चाहिए, संवेदना चाहिए,
अगर तुममे है तो समझो,
और मुझे प्यार करो,
सिर्फ़ मुझे ही नही, इस सारे जाग को,
जो न तुम्हारा है, न हमारा है
लेकिन फिर भी,
एक अनकहा रिश्ता बनाता है.
अमू.
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November 13, 2007
आज फिर कोचिंग से निकली और आँखे उसी से जा टकराई. पहले पहले तो यूँ उसका रोज़ यहाँ गेट के पास खड़े रहना और मुझे घुरना मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगता थ.पर अब जैसे आदत सी हो गयी है. मैने एक दिन सोचा ये मेरा पीछा क्यूं करता है?कुछ कहता भी नही और बस मेरे कोचिंग आने से पहले और जाने तक सिर्फ़ मेरा इंतज़ार करता है. आख़िर ये कुछ कहता क्यूं नही?एक दिन मैने ही हिम्मत करके उससे पूछा. और उसने कहा की मैं उसे बहुत पसंद हूँ,और वो मुझसे दोस्ती करना चाहता है.वो भी मेडिकल की तैयारी कर रहा था. जाने क्यूं पर मैने उससे दोस्ती कर ली. ये दोस्ती कब प्यार मे बदल गयी ये पता ही नही चला. दोनो घंटो बातें करते थे,और इस तरह 6 महीना कैसे निकल गया पता ही नही चला.
इसी बीच मेरे घर मे मेरे पापा की जॉब चली गयी और मैने घर मे रहना शुरू कर दिया. एक दिन उसका फोन आया और उसने मुझे मिलने को बुलाया. मैं किसी तरह वहा गयी,जब उसे सारी बात मालूम हुई तो उसने कहा की उसका एम्स मे अड्मिशन हो गया है,और वो दिल्ली जा रहा है. मैने उसे वहा जाके कॉंटॅक्ट करने को कहा. पर काफ़ी दिनो तक उसका कोई फोन नही आया. मैं इंतज़ार करती रही. एक दिन फोन आया और उसने कहा की स्नेहा तुम मुझे भूल जायो क्योंकि मैं अब अपने स्टेटस की लड़की से शादी करूँगा. तुम मेरे लायक नही हो. मैने उसी समय फोन रख दिया.
इस बात का मुझपर इतना असर हुआ कि मैं जी जान से अपने स्टडी मे लग गयी,तब तक घर की हालत भी सही हो गयी थी. मैने मेडिकल मे टॉप किया. उसी बीच मुझे प्रांजल मिला. वो मेरे साथ ही पढ़ता था. हम दोनो अच्छे दोस्त बन गये, मैने उससे रमेश के बारे मे बताया. उसने कहा “जिस तरह प्रकृति मे सिर्फ़ एक ही रंग नही होते उसी तरह हर इंसान एक जैसा नही होता”. इस वाक़या ने मेरे दुख को हल्का कर दिया, और मैं मन लगाके पढ़ने लगी. मैने वहा भी टॉप किया और प्रांजल सेकेंड आया. हमारी पहली पोस्टिंग डेलही मे ही हुई. उसने मेरे पापा से बात की और हमारी शादी फिक्स हो गयी. सगाई वाले दिन मुझे रमेश नज़र आया. वो काफ़ी काफ़ी बुझा बुझा था. वो आज फिर मुझसे बात करना चाह रहा था पर हिम्मत नही जुटा पा रहा था.
इस बार भी मैं ही उसके पास गयी और उसका हाल चाल पूछा. उसने मुझसे माफ़ी माँगी और कहा की वो अब भी मुझसे प्यार करता है. उसने मुझे न कहके ग़लती की थी………और न जाने क्या क्या. मैं सिर्फ़ सुनती रही और सिर्फ़ एक ही बात कहा-” तुम पहले भी मेरे दोस्ती और प्यार के लायक नही थे और न आज हो. प्राकृति के हज़ारो रंग है और आज उसने मेरे पे मेहरबानी की है तो तुम्हे मैं फिर से अच्छी लगने लगी हूँ. मैं आज उसका साथ दूँगी जिसने फीके रंग मे भी मेरा साथ दिया था” वो आज चुपचाप मुझे सुन रहा था. मैने अपनी बात पूरी की और वहा से चली गयी.
सच आज प्रकृति ने अपना सुनहला रंग दिखा ही दिया.
अमू.
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November 13, 2007
हे! प्रिए माना की तुम जननी हो,
तुम कर्मनी हो, तुम सहिष्णु हो,
पर! क्या तुम आग नही हो?
और क्या शक्ति भी नही हो?
गीता का श्लोक तो तुमने पढ़ा होगा,
पर क्या उसका मर्म कभी समझा है?
ज़ुल्म जब असहिष्णु बन जाए,
आत्याचार जब सीमा पार कर जाए,
अपने आधिकारो के लिए लड़ना ना पाप होगा,
करना अस्तित्व की रक्षा तब ना श्राप होगा,
ज़िंदगी के मर्म को जो तुम समझ लोगी,
ज़िंदगी तुम्हारी कभी नर्क ना होगी.
जीना जब तुम्हारा दुश्वार हो जाएगा,
अपनी शक्ति का भान तुम्हे तब होगा,
वक़्त रहते वक़्त को गर पहचान तुम लोगी,
एक नये रामायण की रचना तुम करोगी.
जहा राम नही सीता को,
राम की परीक्षा का हक़ होगा,
जहा राधा नही श्याम को,
विरह का ताप झेलना होगा.
तब एक नये भारत का उत्थान होगा,
जहा मर्यादापुरुषोत्तम ही नही,
जननी का भी आदर सम्मान होगा,
तब इसी धरती पर देवता आएँगे,
और ये धारा स्वर्ग बन जाएगी.
अमू.
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Posted by Amrita Bharti
November 13, 2007
उसकी वे आँखे कभी भी मेरा पीछा नही छोड़ती. मैं रातों को अभी भी ठीक से सो नही पाता हूँ मन ग़ज़ब सा बेचैनी महसूस करता है. मेरा बचपन कितना मासूम कितना निच्छल था. मैं अभी भी सोच कर रो उठता हूँ कि मैने ये क्या कर डाला.
वो गर्मी की तपती धूम का समय था. मैं अपने एसी रूम को छोड़ कही जाना नही चाह रहा था पर क्या करूँ ये डॉक्टर का काम भी न ….क्लिनिक से फोन आया और मैं भागा भागा अपने कार तक पहुचा. एक तो गर्मी का मौसम उपर से ये पसीना. वैसे भी एसी से बाहर आते ही हम जैसे चिढ़ जाते हैं. तभी मैने अपने गार्ड से किसी ओल्ड एज की औरत को लड़ते सुना. मैने चीलाकर पूछा तो गार्ड सहम गया पर वो बुढिया मेरे पास दौड़ी दौड़ी आई. वो कहने लगी मेरा बेटा काफ़ी बीमार है आप उसे देख लो. वो मेरा एकलौता सहारा है, उसके बग़ैर मैं मार जाऊँगी, आप ही उसे बचा सकते हो. पर मैं तो पहले से ही डिस्टर्ब था. मैने उसे डाँता और कहा की मुझे काम है तुम किसी और डॉक्टर के पास चली जाओ. पर वो कहने लगी कि घर मे कमाने वाला और कोई नही. मेरे पास पैसे नही है,पर आप तो मुझे जानते हो. आप मेरे बेटे को बचा लो, मैं धूप मे खड़ा होके अपने गाँव के पुराने बोर दिनो को याद नही कर सकता था सो मैं चला गया. टालने के लिए उसे बाद मे आने को कहा. क्लिनिक मे मैं देर रात तक बिज़ी रहा. पर देखता क्या हूँ वो अभी भी गेट के बाहर खड़ी है. मैं झुंझला गया. मैने अनदेखा करते हुए अंदर जाना चाहा. पर वो मेरे पैरो को ज़ोर से पकड़ ली और रोने लगी. मैने उसे फटकारा तो वो कहने लगी मैं तुम्हारी माँ के उमर की हूँ. बचपन मे तुम्हे खेलाई हुई हूँ. मैने कितनी मुश्किलों के बाद तुम्हारा पता ढुंड निकाला है, अब तुम ही मेरा सहारा हो. मेरे लाल को बचा लो……पर मैं अपने गरूर मे चूर कुछ देख नही पाया. वो रात भर मेरे गेट के पास बैठी रही ….रोती रही. और मैं अपने रूटिन लाइफ मे बिज़ी हो गया.
दूसरे दिन वो मुझे दिखी नही. मैने दरबान से पूछा तो वो अपनी निरीह सी आँखो मे मेरे लिए नफ़रत भरकर कहा. साहब जी उसका लड़का मर गया. वो भी मर गयी होगी. अब यहाँ नही आएगी काफ़ी तंग कर रखा था उसने. मैं एक सेकेंड को सोच मे पड़ गया पर फिर सोचा ये सब भगवान की मर्ज़ी. इलाज के बाद भी तो लोग मरते हैं. बस फिर क्या था, मैं अपने रास्ते जाने लगा तभी देखता हूँ वो रोड के किनारे एक लाश की तरह पड़ी हुई थी. मैने गाड़ी रूकवाई और पुछा….तुम यहाँ? वो मेरे तरफ़ देखी और मुझे घुरने लगी. उसके मुह मे ज़बान नही था या वो कुछ बोल नही सकती थी. पर वो मुझे घुरति रही घुरति रहि……तब तक जब तक मैं वहा से हटा नही. फिर वापस आने के समय मैने देखा वो मरी पड़ी थी. लोग उसे घेर कर खड़े थे. मैं परेशान हो उठा. तभी मेरे मन ने कहा …तुम और उदास? तुम्हे तो लोगो को मरते देखने की आदत है .तुम कैसे ???????????? मैने अपने मन को धिक्कारा और पुराने ख़यालो मे चला गया. मैं 12th का बोर्ड एक्जाम देके अपने गावं गया था. वहा मेडिसिन के अभाव मे लोगो को देख मैं सोचता था काश मैं इनकी कुछ सहायता कर पता. मैं किसी को ऐसे मरने नही देता. मेरी प्यारी प्यारी बातें सुनकर दादी और माँ गले से लगा लेती. गावों के और लोग भी आशीष देते नही थकते. शायद सबकी दुआओं का ही फल था कि मैं मेडिकल क्लियर कर पाया. पर मैं डेलही आने के बाद जैसे सन्जोये सपने को खोने लगा था. मैने अपने सारे सपने जिन्हे पूरा करने को मैं डॉक्टर बना था भूल गया. यहाँ आके मैं मेडिकल मे ली गयी शपथ भी भूल गया, बस अपनी अलग ज़िंदगी और अपना अलग एम बना लिया. सिर्फ़ आगे आने के चकर मे मैने अपनो को पीछे छोड़ दिया……..
पर आज मैं उन्ही लोगो के पास वापस जाना चाहा हूँ. उसकी आँखे मुझसे सारी बाते कह गयी. अब मैं यहाँ नही रह सकता. मैं उसके बेटे को तो नही बचा पाया पर शायद किसी और को बचा लूं.
अमू.
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Posted by Amrita Bharti