जननी!

हे! प्रिए माना की तुम जननी हो,
तुम कर्मनी हो, तुम सहिष्णु हो,
पर! क्या तुम आग नही हो?
और क्या शक्ति भी नही हो?

गीता का श्लोक तो तुमने पढ़ा होगा,
पर क्या उसका मर्म कभी समझा है?
ज़ुल्म जब असहिष्णु बन जाए,
आत्याचार जब सीमा पार कर जाए,

अपने आधिकारो के लिए लड़ना ना पाप होगा,
करना  अस्तित्व की रक्षा तब ना श्राप होगा,
ज़िंदगी के मर्म को जो तुम समझ लोगी,
ज़िंदगी तुम्हारी कभी नर्क ना होगी.

जीना जब तुम्हारा दुश्वार हो जाएगा,
अपनी शक्ति का भान तुम्हे तब होगा,
वक़्त रहते वक़्त को गर पहचान तुम लोगी,
एक नये रामायण की रचना तुम करोगी.

जहा राम नही सीता को,
राम की परीक्षा का हक़ होगा,
जहा राधा नही श्याम को,
विरह का ताप झेलना होगा.

तब एक नये भारत का उत्थान होगा,
जहा मर्यादापुरुषोत्तम ही नही,
जननी का भी आदर सम्मान होगा,
तब इसी धरती पर देवता आएँगे,
और ये धारा स्वर्ग बन जाएगी.

अमू.

3 Responses to “जननी!”

  1. प्रेम पीयूष Says:

    कविताँए और कहानी दोनो ही काफी पसंद आयी ।

    तुम्हारी लेखनी में एक खास किस्म की प्रवाह है – लेखनी को शुभकामनाएँ ।

  2. Amrita Bharti Says:

    hello piyush ji,
    aapko meri kahani aur kawita pasand aayi, ye mere liye liye kafi khushi ki baat hai.mujhe isse protshahan milega.
    thanks a lot
    amu.

  3. Ghayal Says:

    aapke likhne ka style mujhe pasand aaya………..

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