काश! संविधान मे इच्छामृत्यु का प्रावधान होता,
डॉक्टर के पास महीनो से नंबर लगा होता,
उसमे भी बड़े लोगो की कतार अलग होती,
ग़रीबो की अपनी पहचान अलग होती,
उसमे भी रिश्वत की साख भारी होती,
मेरी हर साँस कल की आभारी होती.
अपनी ज़िंदगानी की कहानी ही कुछ ऐसी,
ग़रीबी ,एक बीमारी जिससे मौत डरा करती
मान लेती सरकार तो सुझाव ये होता,
ग़रीबी दूर करने का प्रावधान यह होता,
इक्छामृत्यु के लिए इश्तिहार दिए जाते,
ग़रीबो को आरक्षण के उपहार दिए जाते.
हर समस्या का समाधान हो ही जाता,
सरकारी पास यदि हमे भी मिल जाता,
ज़ुल्म सहने की आदत तो पुरानी है,
पार!आत्महत्या करने मे बहुत परेशानी है,
ज़िंदगी से लड़ने को जब मौत बुलाती है,
अपनी हर कोशिश भी नाकाम हो जाती है.
काश सरकार इतनी सेवा कर पाती,
मौत चाहने वाले को मौत दे दी जाती,
अच्छा होता संविधान मे संसोधन हो जाता
आरक्षण के सवाल पे जातीयता ना होता
कहते हैं ऐसी सोच कायरता होती है
यूँ जीकर देखें तो पता चले,
कि ज़िंदगी क्या होती है
जीने की इच्छा पर हमे भी होती,
ज़िंदगी हमारी गर ख़ूबसूरत होती.
काश! बेरोज़गारी की समस्या,का भी हल होता,
जनसंख्या का बोझ भी कुछ कम होता.
तब ग़रीबी की बीमारी वंशानुगत ना होती
जो दवाईयाँ सुलभ तो बीमारियाँ ना होती
वह चाह ख़ास होती,जो हो सके ना पूरी
क़ीमत उसी की है, जो बस रह गयी अधूरी.
तब्दीली आ गयी जो,थोड़ी सी सोच मे भी
ना रोग भारी होता,ना बीमारी सरकारी होती,
ना रोती जो बीवियाँ, जो बच्चे ना भूखे सोते,
ना नींद ख़ाली होती,ना सपने भी रंग खोते.
काश! इन तकलीफ़ो का कोई तो हल होता,
ना मरने का ख़्वाब होता,ना जीने का रंज होता…..
अमू.
Posted by Amrita Bharti