November 18, 2008
वो कॉलेज का पहला दिन
याद है! वो कॉलेज का पहला दिन
कभी घबराना ,कभी शरमाना,
कभी बातें बनाना,कभी ख़ामोश हो जाना,
किसी को चुपके से देखना,किसी से आँखे चुराना,
किसी को हँसाना,किसी से रूठ जाना!
हाँ! याद है वो पहला दिन,
मैं डरी सी थी,सहमी सी थी
पापा कि उंगली पकड़ी सी थी,
यहाँ कि दुनिया अलग सी थी,
मेरी दुनिया कि नक़ल न थी!
हाँ! याद है वो पहला दिन,
पुराने ख़यालों से ख़ुद को निकालना,
नये माहौल मे ख़ुद को ढालना,
कभी मायूष हुई तो कभी आई रुलाई,
पैर! हिम्मत ना हारी,ना ही बौखलाई!
हाँ! याद है वो पहला दिन
धीरे धीरे ही सही,
पैर!चलती रही ,चलती रही,
ज़िंदगी के इस भोर को,
अपनाती रही,गुनगुनाती रही.
याद है वो कॉलेज का पहला दिन.
अमू.
4 Comments |
मेरी कविताएँ |
Permalink
Posted by Amrita Bharti
November 18, 2008
ज़िंदगी
ज़िंदगी तू बड़ी ही दगाबाज है,
तेरा कुछ भरोसा नही,
कभी बना दे,कभी बिगार दे,
तेरा कुछ ऐतबार नही.
जो चाहा तूने तो मिला दिया,
जो मुकरा तो बिछुरा दिया,
आह! तू ये कैसी पहेली है,
किसी को ख़ाली ज़मीन,तो किसी
को खुला आसमान दिया.
कोई उलझा तो तुझसे,
तूने उसे सुलझा दिया,
कोई भागा जो तुझसे,
तूने किनारा उसे ही दिया.
जो तेरी ही आस मे हैं,
तू जाती नही उनके पास मे है,
भागती है कस्तूरी गंध की तरह,
हम ढूंढते है म्रिग मरिचका की तरह.
सच! तू बड़ी ही निश्थुर है,
एक बड़ी सी उलझन है
पर! हम भी तो ज़िंदादिल इंसान हैं,
पाएँगे तुझे अफ़साने की तरह.
अमू.
1 Comment |
मेरी कविताएँ |
Permalink
Posted by Amrita Bharti
November 18, 2008
एक जूते की आत्मब्याथा
लोग कहते हैं,मैं हीन हूँ
मुझे छुवो मत, मुझसे दूर रहो,
घर लाके एक कोने मे,
मुझे यूँ बिठा देते हैं,
मानो की मैं अछूत हूँ.
वही जब बाहर जाना होता है,
मुझे प्यार से उठाया जाता है,
मुझे निहारा जाता है,
और चमकाया जाता है,
फिर ,अपने संग ले जाया जाता है.
उनके इसी प्यार के खातिर,
दिन भर उनके साथ हूँ चलती,
कभी रोडा ,तो कभी पत्थर
और कभी कीचड़ और काँटे भी,
चुभते हैं, रुलाते हैं मुझको,
फिर भी आँच ना आने देती उनको.
पर! फिर शाम होती है,
मैं पड़ी रहती हूँ बेबस सी,
एक ग़रीब,दुख्यारी सी,
दिन भर की तीस तब उठती है तन मे,
और रात भर आहें भरती हूँ मन मे.
फिर से सूरज आता है,
संग अपने रोशनी लता है,
तब मेरा आँधियारा भी ख़त्म होता है,
जब मालिक के पॉवो को छूना होता है.
अमू.
2 Comments |
मेरी कविताएँ |
Permalink
Posted by Amrita Bharti
November 18, 2008
आरक्षण
आरक्षण का बवाल है,
आरक्षण का सवाल है.
ये दलित हैं,
ये ग़रीब हैं,
ये अल्पसंख्यक हैं,
ये निसहाए हैं,
इनके आरक्षण का बवाल है,
बिन मेहनत के रोटी का सवाल है.
ये अनपढ़ हैं,
ये नासमझ हैं,
ये बेकार हैं,
ये बेरोज़गार हैं,
इनके आरक्षण का बवाल है,
बिन पढ़ाई के डिग्री का सवाल है.
ये शोषित हैं,
ये क्षोभीत हैं,
ये सताए गाये हैं,
ये दुत्कारे गाये हैं,
इनके आरक्षण का बवाल है,
अब इनके शोषण करने का सवाल है.
अमू.
Leave a Comment » |
मेरी कविताएँ |
Permalink
Posted by Amrita Bharti
November 18, 2008
बिटिया
एक दिन बापू ने स्नेह करते करते कहा,
बेटियाँ पराया धन होती है,
किसी और की अमानत होती है,
उनसे ज़्यादा स्नेह ठीक नही,
ये प्यार , ये दुलार ठीक नही.
बाद मे रोती छोड़ चली जाएगी,
और हमें याद बहुत आएगी,
हम तन्हा ही रह जाएँगे,
पर! बार बार मिल ना पाएँगे.
वो अपना जहाँ बनाएगी,
वहाँ खुशी से रम जाएगी,
हम यादों के सहारे ही जी पाएँगे,
और आशीष तुझे दे जाएँगे.
तेरे बचपन की खट्टी- मीठी यादें.,
वो तेरे लुभावने वादें,
तू उसे संग ना ले जाना अपने,
वरना टूट जाएँगे मेरे सपने.
अमू.
2 Comments |
मेरी कविताएँ | Tagged: Add new tag |
Permalink
Posted by Amrita Bharti