एक जूते की आत्मब्याथा

एक जूते की आत्मब्याथा

लोग कहते हैं,मैं हीन हूँ
मुझे छुवो मत, मुझसे दूर रहो,
घर लाके एक कोने मे,
मुझे यूँ बिठा देते हैं,
मानो की मैं अछूत हूँ.

वही जब बाहर जाना होता है,
मुझे प्यार से उठाया जाता है,
मुझे निहारा जाता है,
और चमकाया जाता है,
फिर ,अपने संग ले जाया जाता है.

उनके इसी प्यार के खातिर,
दिन भर उनके साथ हूँ चलती,
कभी रोडा ,तो कभी पत्थर
और कभी कीचड़ और काँटे भी,
चुभते हैं, रुलाते हैं मुझको,
फिर भी आँच ना आने देती उनको.

पर! फिर शाम होती है,
मैं पड़ी रहती हूँ बेबस सी,
एक ग़रीब,दुख्यारी सी,
दिन भर की तीस तब उठती है तन मे,
और रात भर आहें भरती हूँ मन मे.

फिर से सूरज आता है,
संग अपने रोशनी लता है,
तब मेरा आँधियारा भी ख़त्म होता है,
जब मालिक के पॉवो को छूना होता है.

अमू.

2 Responses to “एक जूते की आत्मब्याथा”

  1. vips Says:

    bahut hi badhiya likha hai, jo wekti in nirjeev chijon ke liye bhi itna karuna rakhta hai woh to aur bhi achchi kavitayen likh sakta hai.

  2. vips Says:

    bahut hi badhiya likha hai, jo wekti in nirjeev chijon ke liye bhi itna karuna rakhta hai woh to aur bhi achchi kavitayen likh sakta hai.

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