ज़िंदगी

ज़िंदगी

ज़िंदगी तू बड़ी ही दगाबाज है,
तेरा कुछ भरोसा नही,
कभी बना दे,कभी बिगार दे,
तेरा कुछ ऐतबार नही.

जो चाहा तूने तो मिला दिया,
जो मुकरा तो बिछुरा दिया,
आह! तू ये कैसी पहेली है,
किसी को ख़ाली ज़मीन,तो किसी
को खुला आसमान दिया.

कोई उलझा तो तुझसे,
तूने उसे सुलझा दिया,
कोई भागा जो तुझसे,
तूने किनारा उसे ही दिया.

जो तेरी ही आस मे हैं,
तू जाती नही उनके पास मे है,
भागती है कस्तूरी गंध की तरह,
हम ढूंढते है म्रिग मरिचका की तरह.

सच! तू बड़ी ही निश्थुर है,
एक बड़ी सी उलझन है
पर! हम भी तो ज़िंदादिल इंसान हैं,
पाएँगे तुझे अफ़साने की तरह.

अमू.

One Response to “ज़िंदगी”

  1. Rewa Smriti Says:

    Wah bahut khub…khas kar last stanza….haan bachchi…ham bhi to zindadil insan hein :)

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