November 13, 2007
आज फिर कोचिंग से निकली और आँखे उसी से जा टकराई. पहले पहले तो यूँ उसका रोज़ यहाँ गेट के पास खड़े रहना और मुझे घुरना मुझे बिल्कुल अच्छा नही लगता थ.पर अब जैसे आदत सी हो गयी है. मैने एक दिन सोचा ये मेरा पीछा क्यूं करता है?कुछ कहता भी नही और बस मेरे कोचिंग आने से पहले और जाने तक सिर्फ़ मेरा इंतज़ार करता है. आख़िर ये कुछ कहता क्यूं नही?एक दिन मैने ही हिम्मत करके उससे पूछा. और उसने कहा की मैं उसे बहुत पसंद हूँ,और वो मुझसे दोस्ती करना चाहता है.वो भी मेडिकल की तैयारी कर रहा था. जाने क्यूं पर मैने उससे दोस्ती कर ली. ये दोस्ती कब प्यार मे बदल गयी ये पता ही नही चला. दोनो घंटो बातें करते थे,और इस तरह 6 महीना कैसे निकल गया पता ही नही चला.
इसी बीच मेरे घर मे मेरे पापा की जॉब चली गयी और मैने घर मे रहना शुरू कर दिया. एक दिन उसका फोन आया और उसने मुझे मिलने को बुलाया. मैं किसी तरह वहा गयी,जब उसे सारी बात मालूम हुई तो उसने कहा की उसका एम्स मे अड्मिशन हो गया है,और वो दिल्ली जा रहा है. मैने उसे वहा जाके कॉंटॅक्ट करने को कहा. पर काफ़ी दिनो तक उसका कोई फोन नही आया. मैं इंतज़ार करती रही. एक दिन फोन आया और उसने कहा की स्नेहा तुम मुझे भूल जायो क्योंकि मैं अब अपने स्टेटस की लड़की से शादी करूँगा. तुम मेरे लायक नही हो. मैने उसी समय फोन रख दिया.
इस बात का मुझपर इतना असर हुआ कि मैं जी जान से अपने स्टडी मे लग गयी,तब तक घर की हालत भी सही हो गयी थी. मैने मेडिकल मे टॉप किया. उसी बीच मुझे प्रांजल मिला. वो मेरे साथ ही पढ़ता था. हम दोनो अच्छे दोस्त बन गये, मैने उससे रमेश के बारे मे बताया. उसने कहा “जिस तरह प्रकृति मे सिर्फ़ एक ही रंग नही होते उसी तरह हर इंसान एक जैसा नही होता”. इस वाक़या ने मेरे दुख को हल्का कर दिया, और मैं मन लगाके पढ़ने लगी. मैने वहा भी टॉप किया और प्रांजल सेकेंड आया. हमारी पहली पोस्टिंग डेलही मे ही हुई. उसने मेरे पापा से बात की और हमारी शादी फिक्स हो गयी. सगाई वाले दिन मुझे रमेश नज़र आया. वो काफ़ी काफ़ी बुझा बुझा था. वो आज फिर मुझसे बात करना चाह रहा था पर हिम्मत नही जुटा पा रहा था.
इस बार भी मैं ही उसके पास गयी और उसका हाल चाल पूछा. उसने मुझसे माफ़ी माँगी और कहा की वो अब भी मुझसे प्यार करता है. उसने मुझे न कहके ग़लती की थी………और न जाने क्या क्या. मैं सिर्फ़ सुनती रही और सिर्फ़ एक ही बात कहा-” तुम पहले भी मेरे दोस्ती और प्यार के लायक नही थे और न आज हो. प्राकृति के हज़ारो रंग है और आज उसने मेरे पे मेहरबानी की है तो तुम्हे मैं फिर से अच्छी लगने लगी हूँ. मैं आज उसका साथ दूँगी जिसने फीके रंग मे भी मेरा साथ दिया था” वो आज चुपचाप मुझे सुन रहा था. मैने अपनी बात पूरी की और वहा से चली गयी.
सच आज प्रकृति ने अपना सुनहला रंग दिखा ही दिया.
अमू.
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Posted by Amrita Bharti
November 13, 2007
उसकी वे आँखे कभी भी मेरा पीछा नही छोड़ती. मैं रातों को अभी भी ठीक से सो नही पाता हूँ मन ग़ज़ब सा बेचैनी महसूस करता है. मेरा बचपन कितना मासूम कितना निच्छल था. मैं अभी भी सोच कर रो उठता हूँ कि मैने ये क्या कर डाला.
वो गर्मी की तपती धूम का समय था. मैं अपने एसी रूम को छोड़ कही जाना नही चाह रहा था पर क्या करूँ ये डॉक्टर का काम भी न ….क्लिनिक से फोन आया और मैं भागा भागा अपने कार तक पहुचा. एक तो गर्मी का मौसम उपर से ये पसीना. वैसे भी एसी से बाहर आते ही हम जैसे चिढ़ जाते हैं. तभी मैने अपने गार्ड से किसी ओल्ड एज की औरत को लड़ते सुना. मैने चीलाकर पूछा तो गार्ड सहम गया पर वो बुढिया मेरे पास दौड़ी दौड़ी आई. वो कहने लगी मेरा बेटा काफ़ी बीमार है आप उसे देख लो. वो मेरा एकलौता सहारा है, उसके बग़ैर मैं मार जाऊँगी, आप ही उसे बचा सकते हो. पर मैं तो पहले से ही डिस्टर्ब था. मैने उसे डाँता और कहा की मुझे काम है तुम किसी और डॉक्टर के पास चली जाओ. पर वो कहने लगी कि घर मे कमाने वाला और कोई नही. मेरे पास पैसे नही है,पर आप तो मुझे जानते हो. आप मेरे बेटे को बचा लो, मैं धूप मे खड़ा होके अपने गाँव के पुराने बोर दिनो को याद नही कर सकता था सो मैं चला गया. टालने के लिए उसे बाद मे आने को कहा. क्लिनिक मे मैं देर रात तक बिज़ी रहा. पर देखता क्या हूँ वो अभी भी गेट के बाहर खड़ी है. मैं झुंझला गया. मैने अनदेखा करते हुए अंदर जाना चाहा. पर वो मेरे पैरो को ज़ोर से पकड़ ली और रोने लगी. मैने उसे फटकारा तो वो कहने लगी मैं तुम्हारी माँ के उमर की हूँ. बचपन मे तुम्हे खेलाई हुई हूँ. मैने कितनी मुश्किलों के बाद तुम्हारा पता ढुंड निकाला है, अब तुम ही मेरा सहारा हो. मेरे लाल को बचा लो……पर मैं अपने गरूर मे चूर कुछ देख नही पाया. वो रात भर मेरे गेट के पास बैठी रही ….रोती रही. और मैं अपने रूटिन लाइफ मे बिज़ी हो गया.
दूसरे दिन वो मुझे दिखी नही. मैने दरबान से पूछा तो वो अपनी निरीह सी आँखो मे मेरे लिए नफ़रत भरकर कहा. साहब जी उसका लड़का मर गया. वो भी मर गयी होगी. अब यहाँ नही आएगी काफ़ी तंग कर रखा था उसने. मैं एक सेकेंड को सोच मे पड़ गया पर फिर सोचा ये सब भगवान की मर्ज़ी. इलाज के बाद भी तो लोग मरते हैं. बस फिर क्या था, मैं अपने रास्ते जाने लगा तभी देखता हूँ वो रोड के किनारे एक लाश की तरह पड़ी हुई थी. मैने गाड़ी रूकवाई और पुछा….तुम यहाँ? वो मेरे तरफ़ देखी और मुझे घुरने लगी. उसके मुह मे ज़बान नही था या वो कुछ बोल नही सकती थी. पर वो मुझे घुरति रही घुरति रहि……तब तक जब तक मैं वहा से हटा नही. फिर वापस आने के समय मैने देखा वो मरी पड़ी थी. लोग उसे घेर कर खड़े थे. मैं परेशान हो उठा. तभी मेरे मन ने कहा …तुम और उदास? तुम्हे तो लोगो को मरते देखने की आदत है .तुम कैसे ???????????? मैने अपने मन को धिक्कारा और पुराने ख़यालो मे चला गया. मैं 12th का बोर्ड एक्जाम देके अपने गावं गया था. वहा मेडिसिन के अभाव मे लोगो को देख मैं सोचता था काश मैं इनकी कुछ सहायता कर पता. मैं किसी को ऐसे मरने नही देता. मेरी प्यारी प्यारी बातें सुनकर दादी और माँ गले से लगा लेती. गावों के और लोग भी आशीष देते नही थकते. शायद सबकी दुआओं का ही फल था कि मैं मेडिकल क्लियर कर पाया. पर मैं डेलही आने के बाद जैसे सन्जोये सपने को खोने लगा था. मैने अपने सारे सपने जिन्हे पूरा करने को मैं डॉक्टर बना था भूल गया. यहाँ आके मैं मेडिकल मे ली गयी शपथ भी भूल गया, बस अपनी अलग ज़िंदगी और अपना अलग एम बना लिया. सिर्फ़ आगे आने के चकर मे मैने अपनो को पीछे छोड़ दिया……..
पर आज मैं उन्ही लोगो के पास वापस जाना चाहा हूँ. उसकी आँखे मुझसे सारी बाते कह गयी. अब मैं यहाँ नही रह सकता. मैं उसके बेटे को तो नही बचा पाया पर शायद किसी और को बचा लूं.
अमू.
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Posted by Amrita Bharti